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गंगा –प्रदूषण...डा श्याम गुप्त

Posted On: 12 Mar, 2015 कविता,Others में

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गंगा –प्रदूषण ( घनाक्षरी छंद )

१.

सदियों से पुष्प बहे, दीप-दान होते रहे ,

दूषित हुई न कभी नदियों की धारा है |

होते रहे हैं नहान, मुनियों के ज्ञान-ध्यान,

मानव का  सदा रही,  नदिया सहारा है |

बहते रहे शव भी, मेले- कुंभ  होते रहे ,

ग्राम नगर बस्ती के  जीवन की  धारा है |

श्रद्धा, भक्ति, आस्था के कृत्यों से प्रदूषित गंगा .

छद्म-ज्ञानी, अज्ञानी, अधर्मियों का नारा है | |

२.

नदीवासी जलचर, मीन  कच्छप मकर ,

नदिया सफाई हित, प्रकृति व्यापार  है |

पुष्प घृत  दीप बाती ,शव अस्थि चिता-भस्म,

जल शुद्धि-कारक,जीव-जन्तु आहार है |

मानव का मल-मूत्र, कारखाना-अपशिष्ट,

बने जल-जीवों के विनाश का आधार है |

यही सब कारण हैं, न कि आस्था के वे दीप,

आस्था बिना हुई प्रदूषित गंगधार है |

3.

फैला अज्ञान तमस, लुप्त है विवेक, ज्ञान ,

श्रृद्धा आस्था से किया मानव ने किनारा है |

अपने ही दुष्कृत्यों का, मानव को नहीं भान

अपने कुकृत्यों से ही मानव स्वयं हारा है |

औद्योगिक गन्दगी, हानिकारक रसायन,

नदियों में बहाए जाते, किसी ने विचारा है |

नगरों के मल-मूत्र, बहाए जाते गंगा में,

इनसे  प्रदूषित हुई, गंगा की धारा है ||

.

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajanidurgesh के द्वारा
March 18, 2015

अच्छी कविता.उत्तम अभिव्यक्ति.

rajanidurgesh के द्वारा
March 18, 2015

वह! बहुत अच्छा. सुन्दर अभिव्यक्ति.

drshyamgupta के द्वारा
April 4, 2015

धन्यवाद दुर्गेश जी …

drshyamgupta के द्वारा
April 4, 2015

धन्यवाद

drshyamgupta के द्वारा
December 15, 2015

dhanyvaad


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