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त्रिपदा अगीत-- डा श्याम गुप्त ...

Posted On: 3 Oct, 2014 Others,कविता में

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मेरे द्वारा प्रणीत….त्रिपदा अगीत–१६-१६ मात्राओं के तीन पदों वाला अतुकान्त गीत

है जो अगीत कविता का एक छंद है—

१..

अंधेरों की परवाह कोई,
न करे, दीप जलाता जाए;
राह भूले को जो दिखाए |

२.

सिद्धि प्रसिद्धि सफलताएं हैं,
जीवन में लाती हैं खुशियाँ;
पर सच्चा सुख यही नहीं है|

३.

चमचों के मजे देख हमने ,
आस्था को किनारे रखदिया ;
दिया क्यों जलाएं हमीं भला|

४.

जग में खुशियाँ उनसे ही हैं,
हसीन चेहरे खिलते फूल;
हंसते रहते गुलशन गुलशन |

५.

मस्त हैं सब अपने ही घरों में ,
कौन गलियों की पुकार सुने;
दीप मंदिर में जले कैसे ?

६.

तुमसे मिलने की खुशी भी है ,

न मिल पाने का गम भी;

कितने गम हैं जमाने में।

7.

खडे सडक इस पार रहे हम,

खडे सडक उस पार रहे तुम;

बीच में दुनिया रही भागती।

८.

कहके वफ़ा करेंगे सदा,

वो ज़फ़ा करते रहे यारो;

ये कैसा सिला है बहारो।

८.

चाहत थी हम कहें बहुत कुछ,

तुम हर लम्हा रहे लज़ाते;

हम कसमसाते ही रह गये।

९.

चर्चायें थीं स्वर्ग नरक की,

देखी तेरी वफ़ा-ज़फ़ा तो;

दोनों पाये तेरे द्वारे।।

१०.

तेरे सन्ग हर रितु मस्तानी,

हर बात लगे नई कहानी;

रात दिवानी सुबह सुहानी।

११.

बात क्या बागे-बहारों की,

बात न हो चांद सितारों की;

बात बस तेरे इशारों की।

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
October 3, 2014

गुप्ता जी आपने बहुत सारगर्भित कविता की रचना की है | शोभा

डा श्याम गुप्त के द्वारा
October 6, 2014

धन्यवाद शोभा जी…..

yamunapathak के द्वारा
October 8, 2014

आदरणीय गुप्ता जी यह मैंने नई रचना प्रकार पढ़ी बहुत अच्छा लगा.भावपूर्ण है.पांच और सात सबसे अच्छे लगे. साभार


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