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त्रिपदा अगीत.....डा श्याम गुप्त.....

Posted On: 27 Sep, 2014 कविता,Others में

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—— मेरे द्वारा प्रसूत..अतुकांत कविता विधा .अगीत का एक विशिष्ट छंद ….त्रिपदा अगीत… जिसमें १६-१६ मात्राओं की तीन पंक्तियाँ होती है ……प्रस्तुत है कुछ त्रिपदा अगीत…..

१.

यद्यपि परिवर्तन मुश्किल है,
साथ वक्त के यदि न चलेंगे;
तो पिछड़े ही रह जायेंगे |

२.

सपने देखें, स्वाभाविक है,
झूठे ख्वाव न देखे कोई;
सच कर पायें, सपने देखें |

3.

राहों में कांटे मिलने पर ,
चलना बंद नहीं कर देना;
अपने पथ से मत डिग जाना |

४.

चर्चाएँ थीं स्वर्ग, नरक की,
देखी तेरी वफ़ा-जफा तो;
दोनों पाए तेरे द्वारे |

५.

जग में खुशियाँ हैं इनसे ही,
हसीन चहरे, खिलते फूल;
खिलते रहते गुलशन गुलशन |

६.

खड़े सड़क इस पार रहे हम,
खड़े सड़क उस पार रहे तुम;
बीच में दुनिया रही भागती |

7.

चमचों के मज़े देख हमने,
आस्था को किनारे रख दिया;
दिया क्यों जलाएं हमीं भला|

८.

अंधेरों की परवाह कोई,
न करे, दीप जलाता जाए;
राह भटके को जो दिखाए |

९.

सिद्धि प्रसिद्धि सफलताएं हैं,
जीवन में लाती हैं खुशियाँ ;
पर सच्चा सुख यही नहीं है |

१०.

मन को समझे यदि यह मानव,
तो समझेगा बात सही है;
तन की कीमत कुछ न कहीं है |

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
September 27, 2014

श्री गुप्ता जी ‘मन को समझे यदि यह मानव ‘ तो समझेगा बात सही हैं , बड़े सुंदर भाव पूरी कविता ही सुंदर है डॉ शोभा

डा श्याम गुप्त के द्वारा
September 30, 2014

धन्यवाद डा शोभा जी….मन की ही तो बात है …


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