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मेरा आधा भरा गिलास......डा श्याम गुप्त ....

Posted On: 25 Sep, 2014 Others,कविता में

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मेरा आधा भरा गिलास……

हम लालग्रह पर पहुँचने की

सफलता का जश्न मना रहे थे,

नवरात्रों में ‘मोम’ के आशीर्वाद

के गुण गा रहे थे |

जोर शोर से देवी माँ के-

पंडाल सजाये जा रहे थे |

जन जन, टूटी-फूटी सडकों,

उफनाते सीवर, बहती हुई नालियां से युक्त

कूड़े के ढेर से बजबजाती हुई गलियों से होकर

कूड़े से पेट भरती गायों को देखेते हुए-

मंदिर जा रहे थे |

उधर बड़े-बड़े संस्थानों में देवियों का यौनशोषण और-

थाने में उनकी अस्मत का सौदा होरहा था |

कवि सम्मलेन में —

‘मुझे कान्हा बना देना,

उसे राधा बना देना’, गाया जा रहा था;

अंग्रेज़ी में हिन्दी पखवाड़ा मनाया जा रहा था |

बच्चे, डैड का ज़माना छोडो,

नए ज़माने का ‘अन्फोर्मल’ अपनाओ गीत गा रहे थे |

करोड़ों खर्च करके लाये हुए

ताम्बे के टुकड़े पर इतरा रहे थे |

वे ग्लेमरस व सेक्सी दिखने की चाह में

अधोवस्त्र दर्शाते हुए-

लक्स, लिरिल से नहा रहीं थीं |

मैंने पूछा ,’ये क्या होरहा है !!!!!’

वे बोले-‘पुराणपंथी हो,

सकारात्मक सोचो, नकारात्मक नहीं,

कमजोरियों पर नहीं, मज़बूतियों पर फोकस रखो,

आधे भरे गिलास को देखो,

आधे खाली को नहीं ||

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
September 27, 2014

आदरणीय गुप्ता जी, सादर नमन! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, वास्तव में ऐसा ही हो रहा है!

Shobha के द्वारा
September 28, 2014

आदरणीय गुप्ता जी बड़े सुंदर आशा वादी विचार डॉ शोभा

डा श्याम गुप्त के द्वारा
September 28, 2014

धन्य्वाद संजय जी

डा श्याम गुप्त के द्वारा
September 28, 2014

धन्यवाद डा शोभा जी …


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